4.27.2008

कश्ती का सफर...


बंद कमरे में मेरी सांस घुटी जाती है
खिड़कियां खोलूं तो जहरीली हवा आती है
आने वाला है बहुत जल्द जमाना अपना
इसी उम्मीद में उम्र अपनी कटी जाती है
क्यों बुरा मौत को कहते हैं जमाने वाले
ये तो इंसान के बुरे वक्त में काम आती है
हादसे लाख को रुकता नहीं कश्ती का सफर
कितने तूफानों में ये नाव बढ़ी जाती है
वो तो बेताब है दामन मेरा भरने को मगर
हाथ फैलाते हुए मुझको हया आती है
तेरी याद को शबनम को कहूं या शोला कहूं
कभी बहलाती है दिल को कभी तड़पाती है
वो तो आई है नया रूप मुझे देने को मगर
जिंदगी मौत से तू किस लिए घबराती है
ये जिगर रहता है जो दिल की एक धड़कन में
क्यों उसे सामने आते हया आती है...

1 comment:

Pri said...

this one is simply beautiful! :)

///क्यों बुरा मौत को कहते हैं जमाने वाले
ये तो इंसान के बुरे वक्त में काम आती है///
loved these lines best!

keep writing!!