7.13.2008

बहुत दूर चला जाऊंगा...



तुम्हारे शहर की हवा
तुम्हारे बदन की खुशबू
सब तुम्हें ही सौंप जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...


वो तुम्हारा सहेलियों में मुस्कुराना
मेरे साथ वो खाली वक्त बिताना
सारी यादें तुम्हे ही सौंप जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...


वो तुम्हारे धरम और समाज की हदें
वो हमारे झूठे रीति-रीवाज
सब यहीं तोड़ जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...


खामियां कुछ मुझमे ही थी जो बात समझा न सका
तुम्हारे सय्यम के पुल के पार जा न सका
जो न दे सका वो सौगातें साथ ले जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...

4 comments:

Anonymous said...

bhut bhavuk note banaya hai. sundar.
aap apna word verification hata le taki humko tipani dene me aasani ho.

seema gupta said...

खामियां कुछ मुझमे ही थी जो बात समझा न सका
तुम्हारे सय्यम के पुल के पार जा न सका
जो न दे सका वो सौगातें साथ ले जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...

"kya bata hai, bdee ha bhavnatmak, or kuch udaas kerne walee rachna hia" बहुत दूर चला जाऊंगा...ye words kaheen ander tk preshan kerne walen hain.

REgards

Anonymous said...

bahut achchhi kavita hai....
such me dil ko chhoo gayi....
http://dev-poetry.blogspot.com/

Pradeep Kumar said...

खामियां कुछ मुझमे ही थी जो बात समझा न सका
तुम्हारे सय्यम के पुल के पार जा न सका
जो न दे सका वो सौगातें साथ ले जाऊंगा
कुछ दिनों में बहुत दूर चला जाऊंगा...

kya khoob kahaa hai dost ! agar ham kisi ko apni baat nahi samjha sakte to sachmuch wo hamaari hi kami hoti hai.............