जब से मैने होश संभाला है एक सवाल जो बार-बार मेरे दिमाग में घूम रहा है वह ये कि कौन हूं मैं, किस दुनिया से आया हूं मैं, कहां जाना है मुझे, क्या करना है मुझे। कम से कम मुझे इतना तो नहीं लगता कि मैं भी इसी स्वार्थी दुनिया का ही इंसान हूं। कहीं मैं कोई परजीवी तो नहीं, क्योंकि मेरी सोच, मेरे ख्याल आज तक किसी इंसान से मिले ही नहीं। अगर मैं सचमुच कोई परजीवी हूं तो मैने इस धरती पर जन्म ही क्यों लिया। क्या मकसद है मेरा इस स्वार्थी दुनिया में आने का। खुदा क्या काम करवाना चाहता है मुझसे, मुझे नहीं लगता कि मैं किसी दुनियावीं काम के फिट हूं। मैडीकल, इंजीनियरिंग, इतिहास सब से मन ऊब चुका है मेरा। बहुत भूखा हूं मैं और प्यासा भी, आखिर ये भूख और प्यास कब खत्म होगी, मैं भी नहीं जानता। आखिर ये जिंदगी की तलाश कब खत्म होगी? आज तक मुझे मेरा नाम नहीं पता चल पाया, आखिर क्या नाम है मेरा, मुझे दुनिया क्यों नहीं जानती, मैं कब सामान्य जिंदगी जी सकूंगा। मैं भी आम इंसानों की तरह जीना चाहता हूं, हंसना चाहता हूं। आखिर ये तलाश कब खत्म होगी कोई तो बताए मुझे। कहीं जिंदगी की तलाश मैं बहुत पिछे न रह जाउं मैं...।
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